Hindi poem, inspiring poem, Uncategorized

चिराग – (सुदूर अंधेरे का)

एक चिराग अंधेरे में जल रहा|
एक परिधि का अंधेरा निकल रहा ||
हवा के थपेड़ों से मंद मंद मचल रहा|
क्योंकि तूफान में भी यह अचल रहा ||

मीलों तक फैल रही है इसकी किरण|
मंद हवा में मचल रहा है जैसे वन की हिरण||
अनंत तक जलने वाला है ये जोत|
दूर दरिया में बून्द सा दिख रहा एक पोत||
लौ है इसकी प्रचंड |
न ही खुद पर इसे घमंड ||
काली गुफा को उजाला किया|
अखंड ज्योति का है यह दिया||
तेज से हर ओर उजाले छा गए|
आज पतंग के पर आज वापस आ गए||

नीचे नीला मध्य पीला और ऊपर लाल |
खुश है शांत है या है बेहाल ||
हर पल हर घड़ी पिघल रहा|
एक चिराग सुदूर अंधेरे में चल रहा||

जल रहा है ईंधन निकल रहा काली धुआं \
फैला रहा उजियारा या बना रहा मौत का कुआँ  ||

कुछ ने इसका गुण गाया कुछ बुरा कहा |

किसी ने पूरा तो किसी ने अधूरा कहा  \\

हर मुसीबत में भी अटल |
एक चिराग सुदूर अंधेर में जल रहा||
तेल की आख्रिर बून्द तक है इसमें जान|
अंधेरा मिटाना ही है इसकी पहचान||
Advertisements

1 thought on “चिराग – (सुदूर अंधेरे का)”

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s