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अर्ध हमसफ़र

‌कैसी है गिला क्या हुआ है मुझसे भूल ।

क्यों इतनी जल्दी हो गए आप पत्थर के फूल।।

पीपल के पत्ते कल की अभी तक न सूखी।

फिर इतनी जल्दी क्यों हुई ये बेरुखी।।

गीरा नहीं एक बूंद आसमां से नीर का।

 पर भींग गया दरिया सा दिल मुसाफिर का।।

जल रहा है तन बदन इस बसंत।

 दिख रहा मीलों तक ना दुखों का अंत ।।

छांव में है दिल जलता।

दिल की अरमा भी पिघलता ।।

धूप में तो लग रही है कपकपी।

धूप की गर्मी न जाने कहां छिपी ।।

बरसे नैना आज बरसात को ।

दूर तक दिखता न साया रात को ।।

भीड़ है पर सुना है आगे का डगर ।

क्योंकि इस सफ़र में है न कोई हमसफर।।

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चिराग – (सुदूर अंधेरे का)

एक चिराग अंधेरे में जल रहा|
एक परिधि का अंधेरा निकल रहा ||
हवा के थपेड़ों से मंद मंद मचल रहा|
क्योंकि तूफान में भी यह अचल रहा ||

मीलों तक फैल रही है इसकी किरण|
मंद हवा में मचल रहा है जैसे वन की हिरण||
अनंत तक जलने वाला है ये जोत|
दूर दरिया में बून्द सा दिख रहा एक पोत||
लौ है इसकी प्रचंड |
न ही खुद पर इसे घमंड ||
काली गुफा को उजाला किया|
अखंड ज्योति का है यह दिया||
तेज से हर ओर उजाले छा गए|
आज पतंग के पर आज वापस आ गए||

नीचे नीला मध्य पीला और ऊपर लाल |
खुश है शांत है या है बेहाल ||
हर पल हर घड़ी पिघल रहा|
एक चिराग सुदूर अंधेरे में चल रहा||

जल रहा है ईंधन निकल रहा काली धुआं \
फैला रहा उजियारा या बना रहा मौत का कुआँ  ||

कुछ ने इसका गुण गाया कुछ बुरा कहा |

किसी ने पूरा तो किसी ने अधूरा कहा  \\

हर मुसीबत में भी अटल |
एक चिराग सुदूर अंधेर में जल रहा||
तेल की आख्रिर बून्द तक है इसमें जान|
अंधेरा मिटाना ही है इसकी पहचान||
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सीमा (Boundary)

एक ऐसी दुनिया की रीति है |
कैसे इंसानियत जीती है ||
यहा कदम-कदम पर सीमा है |
यह हर चीजों की बीमा है||
सोने से पहले जगने की जल्दी है |
पति झालाता सब्जी में ज्यादा हल्दी है||
यह कैसी है मधुशाला  
पीने तो आए है यहा हाला ,
पर चिल्ला रहे हैं शाला ! तूने ज्यादा डाला  
मेरी ग्लास को तूने बना दिया पटियाला ; 
चलने की सीमा है, रुकने की सीमा है ||
उठने की सीमा है, झुकने की सीमा है ||
खाना, खेलना, कूदना, चढ़ना |
या हो रात में देर तक पढ़ना ||
यहा पीने की भी सीमा है |
और जीने की भी सीमा है ||
सीखने की भी सीमा है |
लिखने की भी सीमा है ||
छुपने की भी सीमा है |
रुकने की भी सीमा है ||
यहा अपनो की है सीमा |
मेरे सपनो की है सीमा ||
नहीं है सीमा कुछ चीजों की ,
सीमा नहीं है अंकुर बीजो की;
सीमा नहीं मेरे धड़कन का ,
और धड़कन मे बस्ती उस तड़पन का ;
सीमा नहीं है आकाश का मेरे सास का ,
और सासो मे बसते उस प्यास का :
बस पता है इतना कि यहा थकने की है सीमा |
और मेरे तपने की है सीमा |||

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